
मेघनगर-
जिस दिन भगवान ने दीक्षा ली थी सभी जीवो को अभयदान देते हुए राखी बांधी थी। श्रुत ज्ञान की डोर के साथ क्रिया मिलेगी तो मोक्ष की राखी बनेगी। उक्त उद्गार धर्म सभा को संबोधित करते हुए संयत मुनि जी म.सा ने व्यक्त किए। आज पक्खी पर्व है और लौकिक पर्व भी है जैन धर्म में रक्षाबंधन का महत्व है।
चक्रवर्ती महापदम राजा के समय जैन मुनि विष्णु मुनि जी ने जैन धर्म और जैन साधुओं की रक्षा कर जिन शासन की रक्षा की थी विस्तार से वृतांत सुनाया। इसलिए जैन धर्म में रक्षाबंधन पर्व को धर्म आराधना तप के साथ मनाया जाता है।आपने अनेक प्रेरक प्रसंगों के माध्यम से रक्षाबंधन पर्व के बारे में समझाया। रक्षाबंधन पर्व पर इस बात का ध्यान रखें भाई ने कम दिया तो निंदा नहीं करूंगी और ज्यादा दिया तो अहंकार नहीं करूंगी। साथ ही भाई बहन इस बात का प्रत्याख्यान करें हम एक दूसरे के विरुद्ध कोर्ट में नहीं जाएंगे। बहन को ध्यान रखना होगा मेरा भाई गलत रास्ते पर तो नहीं जा रहा है भाई को भी बहन की रक्षा एवं सही मार्ग पर धर्म आराधना के साथ आगे बढ़ाने की समझाइश देना जरूरी है। तप चक्रेश्वरी श्रीमती स्नेहलता बहन वागरेचा ने 62 उपवास के एवं सिद्धी तप के आराधको ने प्रत्याख्यान लिए। 36 उपवास की तपस्विनी श्रीमती नीता राजेश जैन की तपस्या पूर्ण होने पर सोमवार को वरघोड़ा निवास स्थान से प्रारंभ होकर श्री शांति सुमतिनाथ मंदिर व श्री गोडी जी पारसनाथ मंदिर होते हुए अणु स्वाध्याय भवन पहुंचा। जहां तपस्वी का तप की बोली लगाकर श्रीमती प्रीति वीरेंद्रजी जोड़े से 8,श्रीमती अलका रवीजी सुराणा जोड़े से 6 उपवास रितु झामर 5 की बोली से बहुमान किया। संचालन विपुल धोका किया।





