

मेघनगर। पर्युषण महापर्व के द्वितीय दिवस श्री अणु स्वाध्याय भवन पर विराजित धर्मदास संप्रदाय के वर्तमान गणनायक जिनेन्द्रमुनिजी की आज्ञानुवर्तिनी विदुषी पूज्या मुक्तिप्रभाजी म.सा. ने जिनवाणी वाणी के माध्यम से प्रवचन देते हुए कहा कि जीवन ऐसा होना चाहिए जिसमें जितना हम ग्रहण करें उतना विसर्जन भी करें।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि पेड़ ऑक्सीजन लेकर बदले में फल देता है, गाय घास खाकर दूध देती है। जो कम लेकर ज्यादा लौटाता है, वही देवता कहलाता है। दान के महत्व पर प्रकाश डालते हुए पूज्या ने कहा कि दान से स्वयं और दूसरों दोनों को लाभ होता है। धर्म में दान देने में जहां लोग दुख अनुभव करते हैं, वहीं पाप में खुशी-खुशी खर्च करते हैं। दान पर ममत्व नहीं रखना चाहिए और “मैंने दिया” जैसी भावना से बचना चाहिए।
इस अवसर पर पूज्या प्रशमप्रभाजी ने युवाओं को संदेश दिया कि शरीर के प्रति अधिक राग-द्वेष न रखें। उन्होंने कहा, “ऐसा कोई शोक मत पालिए जिससे पूरा परिवार शोक में डूब जाए।”
धर्मसभा में कई श्रावक-श्राविकाओं ने तप-त्याग के प्रत्याख्यान लिए। श्रीसंघ में पचास से अधिक तपाराधक अट्ठम तप की आराधना कर रहे हैं। धर्मसभा की प्रभावना का लाभ यशवंत कुमार बाफना परिवार ने लीया एवं संचालन विपुल धोका ने किया।





